नारी, तेरी कोमलता कहाँ चली गई?
तू कर्तव्यपरायण, धर्मपरायण,
तेरा शील कहाँ खोया,
तेरा माधुर्य किसने धोया,
इतनी कर्मठ क्यों हुई तू?
इतनी समर्थ क्यों हुई तू ?
निज कोमलता ही त्यज रही,
निज शीतलता ही छूट रही,
नारी .....तेरी कोमलता कहाँ चली गई?
तू योग्य गुणों की खान'
कोमलता थी तेरी पहचान।
"कहाँ ढूंढूं तुझे मेरी कोमल बच्ची".....मेरी माँ का मन रोया,
"कहाँ पाऊं तुझे मेरी धीर तरल माँ".....मेरी अपनी बच्ची रोई,
सच तो यह है नारी,
तेरा भी तो मन रोता है,
कोमल होने जी होता है,
तू स्वयं भी तो अपने आप को ढूंढती है,
"कहाँ गई मेरी वह कोमलता ?
वक्त ने छीनी? निष्ठुर जग ने ले लीनी?
मुझे मेरी कोमलता दे दे ,
मुझे मेरी पहचान दिला दे,
ऐ वक्त, मुझे मुझको लौटा दे!
No comments:
Post a Comment