Thursday, May 22, 2008

निष्ठुर जग

नारी, तेरी कोमलता कहाँ चली गई?

तू कर्तव्यपरायण, धर्मपरायण,

तेरा शील कहाँ खोया,

तेरा माधुर्य किसने धोया,

इतनी कर्मठ क्यों हुई तू?

इतनी समर्थ क्यों हुई तू ?

निज कोमलता ही त्यज रही,

निज शीतलता ही छूट रही,

नारी .....तेरी कोमलता कहाँ चली गई?

तू योग्य गुणों की खान'

कोमलता थी तेरी पहचान।

"कहाँ ढूंढूं तुझे मेरी कोमल बच्ची".....मेरी माँ का मन रोया,

"कहाँ पाऊं तुझे मेरी धीर तरल माँ".....मेरी अपनी बच्ची रोई,

सच तो यह है नारी,

तेरा भी तो मन रोता है,

कोमल होने जी होता है,

तू स्वयं भी तो अपने आप को ढूंढती है,

"कहाँ गई मेरी वह कोमलता ?

वक्त ने छीनी? निष्ठुर जग ने ले लीनी?

मुझे मेरी कोमलता दे दे ,

मुझे मेरी पहचान दिला दे,

ऐ वक्त, मुझे मुझको लौटा दे!

Wednesday, May 21, 2008

एक पल

देखा भी है, सुना भी है, और स्वयं जिया है,
एक समर्पित गृहणी का.........
एक पल भी अपना नहीं है।

अपनेपन से वह भरी हुई है,
अपनी चीजों से वह लदी हुई है।
बच्चे अपने, पति उसका अपना,
गृह अपना, गृह का रख-रखाव अपना,
इतना कुछ उसका अपना ही अपना,
तिस पर भी रखती है, "निज वक्त" का सपना!

कितनी भोली कितनी अनजान,
तू अपनों की है,
तेरा "अपना" क्या है नादान!

Tuesday, May 20, 2008

साथ तुम्हारा


नदी का किनारा, साथ तुम्हारा,
सागर की रेत, तुम मेरे मीत,
तारों की छांह, बांह में तुम्हारी बांह,
नौका विहार, और तुम रहे हो मुझे निहार,
ऐसा भी समय गुज़रा था।

जीवन की भीड़ में तुम मेरी रीढ़,
जलते पाँव, चिलचिलाती धूप, तुम मेरी शीतलता,
कड़ा संसार, तुम मेरा प्यार,
टपकता पसीना, तुम मेरी मन वीना,
ऐसा समय गुज़र रहा है।

वृद्धा मैं , पर अकेली नहीं,
बीमार मैं, पर बिन तुम्हारी नहीं,
कमज़ोर मैं, पर बेचारी नहीं,
धीमी मैं, पर गतिहीन नहीं,
वक्त बताएगा, ऐसा समय गुजरेगा या नहीं.

Monday, May 19, 2008

साहस

कितनी ही बातें होठों तक आती हैं
तुम उन्हें न सुनने का संकेत देती हो,
मैं होठों को सी लेती हूँ।
मैं तुम्हे बताना चाहती थी,
कुछ नया तो नहीं, पर फिर भी,
तुम्हारा ध्यान आकर्षित करना चाहती थी,
इस सच्चाई पर .....कि
वक्त अनमोल है, जीवन अनमोल है।
कुछ ऐसा करने का सहर्ष प्रयास तो करो ,
जिसे तुम कहती हो..."मुझसे हो नहीं सकता"
और मेरा यह कहना तुम्हे बुरा लगता की
"तुम उसे करना नहीं चाहती हो,
वादों के बन्धन मैं तुम पड़ना नहीं चाहती हो।"
पर,
तुम न सुनने का रुख दर्शाते हुए भी,
मेरी बात को सुनती हो।
इसी विश्वाश के के तहत,
मैं तुमसे कुछ भी चर्चा शुरू कर पाने का साहस रखती हूँ।
तुम क्या कर सकती हो क्या नहीं,
यह तुमसे ज़्यादा मैं समझती हूँ।
पर,
करने की इच्छा रखना या न रखना
इस निर्णय का हक सिर्फ़ तुम्हे है।
मीत, कुछ काम अन्निछा से भी कर लिया करो।
करने से पहले न सही,
करके,
और उसके बहुत बाद तक भी,
एक, अत्यन्त सुख भरा एहसास
तुम्हारे साथ रहेगा.