देखा भी है, सुना भी है, और स्वयं जिया है,
एक समर्पित गृहणी का.........
एक पल भी अपना नहीं है।
अपनेपन से वह भरी हुई है,
अपनी चीजों से वह लदी हुई है।
बच्चे अपने, पति उसका अपना,
गृह अपना, गृह का रख-रखाव अपना,
इतना कुछ उसका अपना ही अपना,
तिस पर भी रखती है, "निज वक्त" का सपना!
कितनी भोली कितनी अनजान,
तू अपनों की है,
तेरा "अपना" क्या है नादान!
Wednesday, May 21, 2008
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