Monday, May 19, 2008

साहस

कितनी ही बातें होठों तक आती हैं
तुम उन्हें न सुनने का संकेत देती हो,
मैं होठों को सी लेती हूँ।
मैं तुम्हे बताना चाहती थी,
कुछ नया तो नहीं, पर फिर भी,
तुम्हारा ध्यान आकर्षित करना चाहती थी,
इस सच्चाई पर .....कि
वक्त अनमोल है, जीवन अनमोल है।
कुछ ऐसा करने का सहर्ष प्रयास तो करो ,
जिसे तुम कहती हो..."मुझसे हो नहीं सकता"
और मेरा यह कहना तुम्हे बुरा लगता की
"तुम उसे करना नहीं चाहती हो,
वादों के बन्धन मैं तुम पड़ना नहीं चाहती हो।"
पर,
तुम न सुनने का रुख दर्शाते हुए भी,
मेरी बात को सुनती हो।
इसी विश्वाश के के तहत,
मैं तुमसे कुछ भी चर्चा शुरू कर पाने का साहस रखती हूँ।
तुम क्या कर सकती हो क्या नहीं,
यह तुमसे ज़्यादा मैं समझती हूँ।
पर,
करने की इच्छा रखना या न रखना
इस निर्णय का हक सिर्फ़ तुम्हे है।
मीत, कुछ काम अन्निछा से भी कर लिया करो।
करने से पहले न सही,
करके,
और उसके बहुत बाद तक भी,
एक, अत्यन्त सुख भरा एहसास
तुम्हारे साथ रहेगा.


1 comment:

Vandana Pandey said...

सुंदर कविता है, दिल से लिखी हुई। पढ कर अच्छा लगा।